Paper Code 108) D.Ed (VI, HI, MR) (Common Paper) Unit 1.4 Gender-equity (women’s education) with particular reference to special education लिंग समानता (नारी शिक्षा) विशेष शिक्षा के संदर्भ में
1.4
Gender-equity
(women’s education) with particular reference to special education
लिंग समानता (नारी शिक्षा) विशेष शिक्षा के संदर्भ में
समाज में समानता एक ऐसी अवधारणा है या विकलांगता को लेकर एक ऐसी सोच है कि “विकलांगता
एक अभिशाप है|” हमारे समाज में व्यापक असंतुलन, पिछड़ापन व अन्य कमजोरियों के पीछे
लिंग भेद के एक प्रमुख कारण हैं| चाहे वह सामान्य वर्ग में हो अथवा विकलांगों में|
लिंग भेद की अवधारणा सामाजिकता में भेदभाव को उजागर करती है| जिसके कारण महिलाएं
शिक्षा एवं सुविधाओं से वंचित रहते हैं|
पी.डब्ल्यू.डी एक्ट 1995 में पारित अधिनियम में यह उद्देश्य
निर्धारित किया गया है कि देश के किसी भी विकलांग नागरिक स्त्री एवं पुरुष को
संपूर्ण जीवन जीने और अपनी क्षमताओं के अनुसार संपूर्ण योगदान देने से नहीं रोक सकती
है|
यह सत्य है कि कोई भी समाज लड़कियों एवं स्त्रियों के बिना
प्रगगि नहीं कर सकता है| विकलांगता के क्षेत्र में अथवा शिक्षा के क्षेत्र में
विकलांग बालिकाओं के पिछड़ेपन के निम्नलिखित कारण हैं---
1. विकलांग लड़कियों की शिक्षा की उनके जीवन में कोई प्रासंगिकता नहीं मानी जाती है।
2. माता-पिता एवं अविभावकों की ऐसी सोच है, कि विकलांग लड़कियों की शिक्षा पर व्यय किये गए धन का कोई लाभ नहीं होता है।
3. विकलांग विद्यालयों का अभाव भी इसका एक मुख्य कारण है, इस लिये बहुत से अविभावक चाह कर भी अपनी विकलांग बच्चों को विद्यालय नहीं भेज पाते हैं।
4. समाज की नकारात्मक सोच भी बालिका शिक्षा को प्रभावित करती है।
5. शिक्षित माता-पिता एवं अविभावक शिक्षा के अभाव में अपनी बच्चियों के ज्ञान से अनभिज्ञ रहते हैं।
6. विशेष विद्यालय शहरों में स्थित होने के कारण विकलांग बालक-बालिकाओं के लिये आवागमन की असुविधा होती है।
विकलांग बालिकाओं एवं स्त्रियों की दशा में सुधार के उपाय-
विकलांग बालिकाओं एवं महिलाओं की स्थिति सुधारने में अविभावक, परिवार, समुदाय, समाज, शिक्षक, विद्यालय इत्यादि की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसका वर्णन निम्न प्रकार से है—
अविभावक की भूमिका
माता-पिता निम्नलिखित प्रकार से लड़कियों की स्थिति में सुधार ला सकते हैं—
1. अविभावकों को चाहिये, कि वे विकलांग बालिकाओं की शिक्षा एवं चिकित्सीय के कार्यक्रमों का आवश्यक्तानुसार सुविधा का लाभ उठाएं।
2. बालिकाओं
को पढ़ने के लिये पर्याप्त समय दें।
3. घर परिवार में सामान्य बालिका के समान ही विकलांग बालिकाओं को भी अवसर दें।
4. विकलांग बालिकाओं के मनोबल को ऊंचा उठाने में
प्रोत्साहित करें।
समाज की भूमिका
समाज की भूमिका निम्नलिखित प्रकार से है—
1. समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना।
2. विकलांग बालिकाओं के पुनर्वास में सहयोग करना।
3. शिक्षा के विभिन्न अवसर प्रदान करना।
4. विकलांग बालिकाओं को स्वावलम्बी एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए समाज की मुख्य धारा से जोड़ना।
शिक्षक की भूमिका
शिक्षक निम्नलिखित रूप से बालिकाओं की स्थिति में सुधार सकते हैं—
1. प्रत्येक गतिविधि के अन्तर्गत विकलांग बालिकाओं की भी भूमिका सुनिश्चित करना।
2. विकलांग बालिका के प्रति पक्षपात से दूर रहना, अन्यथा उनमें स्वावलम्बन की भावना जागृत हो करना।
3. विकलांग छात्राओं में नेतृत्व करने की भावना एवं निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना।
4. कक्षा में कुछ ऐसी कहानियाँ या वास्तविक घटना पढ़कर सुनाना, जिनमें साहसी, परिश्रमी, बुद्धिमति एवं आत्मनिर्भर बालिकायों की झलक हो।
सरकार की भूमिका
सरकार की निम्नलिखित भूमिका है—
1. विकलांग बालिकाओं और स्त्रियों की सहभागिता बढ़ाने में पर विद्यालयों एवं समुदायों को विशेष प्रोत्साहन का प्रावधान देना।
2. ऋण प्राप्ति की विशेष सुविधा उपलब्ध कराना।
3. छात्रवृत्ति, पेन्शन एवं बेरोजगारी भत्ता की सुविधा उपलब्ध कराना।
4. विशेष पुस्तक, यंत्र एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षा हेतु निःशुल्क कापी, किताब, बस्ता, ड्रैस आदि उपलब्ध कराना।
इस प्रकार महिलाओं एवं बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के साथ-साथ उन्हें सशक्त करने
हेतु सामाजिक कार्यकर्ताओं को कठिन मेहनत करने की आवश्यक्ता है, तभी हमारा देश समुचित एवं पूर्ण विकास कर सकता है।
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