शिक्षण सूत्र
शिक्षण के कुछ सामान्य
सिद्धांतों के अतिरिक्त शिक्षाविदों ने अपने प्रयोगों के आधार पर कुछ सूत्रों का प्रतिपादन किया है जिन्हें शिक्षण सूत्र कहते हैं| शिक्षण प्रक्रिया के दौरान इन सूत्रों का उपयोग करने से शिक्षक अपने शिक्षण कार्य को
अधिक सुगम, सरल, स्पष्ट, एवं रोचक
बना सकते हैं, शिक्षण
सूत्र इस प्रकार हैं—
1. ज्ञात से अज्ञात की ओर
इसका तात्पर्य यह है कि बालकों को जो ज्ञान प्राप्त है उसी पर नये ज्ञान की आधार शिला रखी
जाए अर्थात जो कुछ बालक जानते हैं उसी को आधार बनाकर वह सिखाना चाहिए, जो वह नहीं जानते हैं|
उदाहरण—शाहजहां के बारे में पढ़ाते समय ताजमहल से शुरू करना चाहिए
क्योंकि ताज ताजमहल ज्ञात है और शाहजहां अज्ञात|
ज्ञात और अज्ञात के बीच का
संबंध स्पष्ट हो जाने से बालक की रूचि आगे के ज्ञान के लिए जागृत हो जाती है|
2. सरल से जटिल की ओर
बालक को पहले सरल का ज्ञान
देना चाहिए, उसके बाद स्तर दर स्तर आगे
बढ़ते हुए जटिल को समझना चाहिए| हमारे देश
में प्राथमिक स्तर का पाठ्यक्रम उसी सूत्र को ध्यान में रखकर निर्मित किया गया है| सामान्यतः अध्यापक को
सदैव बालक को पहले वह सिखाना चाहिए जिसे वे सरलता से
सीख सकें|
उदाहरण—वर्णों या अक्षरों का ज्ञान, शब्दों का ज्ञान और फिर वाक्यों का ज्ञान प्रदान करना
चाहिए|
3. मूर्त से अमूर्त की ओर
इस सिद्धांत के अनुसार यह हमेशा
ध्यान रखना चाहिए कि शिशु का मानसिक
विकास इतना नहीं होता कि वह सूक्ष्म या अमूर्त को समझ सके| केवल दृश्यमान
वस्तुओं के द्वारा ही उनमें सूक्ष्म को
समझने की क्षमता का विकास किया जा सकता है इस शक्ति के विकास के लिए मूर्त से
अमूर्त के सूत्र को ध्यान में रखना चाहिए|
4. पूर्ण से अंश की ओर
इस सूत्र के अनुसार बालक जो कुछ भी सिखाया जाए उसे पहले पूर्ण
रूप से सामने रखा जाए और बाद में उसके अंश या भाग
विशेष को स्पष्ट किया जाए| यह सूत्र Guestal मनोविज्ञान पर
आधारित है जिसके अनुसार हम पहले पूर्ण का प्रत्यक्षीकरण करते हैं और फिर उसके अंशों व अंगों का|
भाषा विकास में भी बालक
वाक्यों को एक इकाई के रूप में सीखता है और
उसके अलग-अलग अंशों पर
बाद में ध्यान देता है|
यहां पर ध्यान रखना आवश्यक है
कि पूर्ण का यह
ज्ञान जटिल नहीं होना चाहिए|
5. विशेष से सामान्य की ओर
बालक को विशेष ज्ञान से
सामान्य ज्ञान की ओर ले जाना चाहिए अर्थात पहले उदाहरण प्रस्तुत किए जाये और फिर उनको उदाहरणों के आधार पर सामान्य नियम बनाए जायें|
6. आगमन से निगमन की ओर
इसके अनुसार कई प्रकार के
उदाहरण प्रस्तुत करके नियमों का निर्धारण किया जाता
है शिक्षक इस सूत्र का प्रयोग विभिन्न विषयों के शिक्षण में कर सकते हैं भाषा में
व्याकरण के पाठ का अध्ययन
करवाने के लिए इस सूत्र का प्रयोग इस प्रकार
किया जा सकता है—
1. विभिन्न वाक्य लेकर उसमें विशेष नाम बताने वाले शब्दों को छांटने के लिए कहा जाएl
2. वाक्य लिखवा
कर उसमें से संज्ञा
शब्द छांटने को कहा जाए|
इस सूत्र के अनुसरण से बालक की रुचि शिक्षण में जागृत रहती है साथ ही प्रत्येक
स्तर पर कार्य करने के पश्चात उसे आगे कार्य करने की प्रेरणा भी मिलती है इस सूत्र में
शिक्षक को अधिक कार्य करना पड़ता है परंतु
इसके द्वारा शिक्षार्थी का अधिगम स्थाई और सार्थक रहता है|
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