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Causes and prevention of disability विकलांगता के कारण एवं बचाव

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1.5 Causes and prevention of disability

विकलांगता के कारण एवं बचाव

हमें समाज में अनेक प्रकार की विक्लांगताएँ देखने को मिलती है। जो विभिन्न कारणों से होती है। सामान्यत: इन कारणों को जन्म से पूर्व के कारण, जन्म के समय तथा जन्म के बाद के कारण की परिस्थितियों से संबंधित करते हैं।

विकलांगता का उचित उपचार एवम्‌ उसकी गंभीरता को कम करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके सही कारण को समझा जाए।

इसके तीन कारण हैं--

1. जन्म से पूर्व

2. जन्म के समय

3. जन्म के बाद

जन्म से पूर्व

1. माँ के मधुमेह रोग हो जाना।

2. थायराइड में वृद्धि हो जाना। (थायरॉक्सिन हार्मोन)

3. हाइपोटेंशन या फेफड़ों से संबंधित बीमारियां हो जाना।

4. माँ को टाइफाइड, खसरा, चेचक, कुबैला का हो जाना।

5. गर्भावस्था में कुपोषण होना।

6. गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक दवाइयों का सेवन करनेस से।

7 गर्भवती माँ का अत्यंत तनावग्रस्त होना तथा दुर्घटना का शिकार होना।

8. अनुवांशिक विकृति होना।

9. गर्भावस्था के समय माता के द्वारा नशीले पदार्थ का सेवन करना जैसे—एल्कोहल, धूम्रपान का सेवन करने से।

10. एक्स-रे के विकिरण के कारण।

11. अत्यधिक निकट से रक्त संबंध में विवाह करने से।

जन्म के समय

1. समय से पूर्व प्रसव।

2. प्रसव काल का लंबा चलना।

3. जन्म के समय बच्चे के किसी अंग या सिर में चोट लगना।

4. गर्भ में बच्चे की सही स्थिति न होना।

5. जन्म के बाद बच्चे का देर से रोना।

6. प्रसव के समय असावधानियां बरतना।

7. शिशु को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलना।

8. विभिन्न कारणों से शिशु के मस्तिष्क में रक्तस्राव होना।

9. जन्म के समय शिशु के गर्दन के चारों ओर नाभिनाल लिपटने के कारण।

10. जन्म के दौरान शिशु को दौरा या घबराहट के कारण।

जन्म के बाद

1. बच्चे को मेनीनजायटीस या इंसेफ्लाइटीस का संक्रमण होने से।

2. मस्तिष्क में अत्यधिक द्रव का होना।

3. गंभीर कुपोषण के कारण।

4. जन्म के पश्चात बच्चों को पीलिया होने के कारण सही समय पर टीकाकरण न होने से।

5. जीवन के किसी भी समय दुर्घटना होने से।

6. घर के सामाजिक वातावरण के प्रभाव से।

7. अंत: स्रावी और थायराइड ग्रंथियों के ठीक प्रकार से कार्य न करने से।

विकलांगता के रोकथाम एवं बचाव

विकलांगता एक ऐसी स्थित है, जिससे सही समय पर इसके कारणों का पता लग जाए, तो इसके रोकथाम के साथ-साथ गंभीरता के स्तर को भी कम किया जा सकता है। विकलांगता की रोकथाम तीन स्तरों पर की जा सकती है--

I. प्राथमिक स्तर

II. द्वितीयक स्तर

III. तृतीयक स्तर

प्राथमिक स्तर

इसमें उन्हीं स्थितियों से बचाव किया जाता है। जिसमें विकलांगता होने की संभावना रहती है। इसके अंतर्गत गर्भावस्था से जन्म के समय की स्थितियां, दुर्घटना एवं बीमारियों से बचाव किया जा सकता है।

द्वितीय स्तर

इसके अंतर्गत ऐसे कारकों का पता लगाकर उनका सुधार करके बालकों की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया जाता है। इसमें प्रधान कारक को हटाया या बदला जाता है तथा संकट की शीघ्र पहचान कर हस्तक्षेप किया जाता है और विभिन्न बीमारियां जैसे पोलियो, कुपोषण, तपेदिक को रोकना आदि।

तृतीयक स्तर

इसमें विकलांग व्यक्ति को दी जाने वाली सेवाएं आती है, इसका उद्देश्य क्षमता को कम करना या इसके प्रभाव को कम करना होता है। उन्हें क्रियात्मक रूप से प्रभावी बनाने तथा उनका प्रबंधन करने में माता-पिता, समुदाय चिकित्सा आदि को सहायता ली जाती है। इस प्रकार प्रशिक्षण देकर विकलांग व्यक्तियों को स्वतंत्र होने के कौशल में वृद्धि की जाती है।

इन तीनों स्तर पर निम्नलिखित बचाव कार्य किए जाते हैं जैसे—

1. अनुवांशिक दवाओं हेतु परामर्श देकर।

2. प्रशिक्षण स्वास्थ्य संबंधी एवम्‌ साफ-सफाई की शिक्षा दी जाती है।

3. कुपोषण तथा विटामिन्स से होने वाली क्षति की जानकारी दी जाती है।

4. विवाह से पूर्व रक्त समूह की जांच करायी जाए।

5. गर्भधारण की आयु 18-35 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

6. निकट के रक्त समूह विवाह नहीं करना चाहिए।

7. माता-पिता को पूर्ण पोषण मुक्त आहार देना।

8. समय-समय पर टीकाकरण अवश्य करना चाहिए।

9. अनावश्यक एवम्‌ बिना परामर्श के दवाएं नहीं लेनी चाहिए।

10. अत्यधिक शारीरिक कार्य एवम्‌ मानसिक तनाव से बचना चाहिए।

11. जन्म से पूर्व प्रसव होने पर शिशु की विशेष देखभाल करनी चाहिए।

12. जन्म के साथ से शिशु का रंग, मांसपेशियां तनाव एवम्‌ प्रक्रियाओं की जांच कर लेनी चाहिए।

13. यदि बच्चे की विकास प्रक्रिया धीमी है तो चिकित्सा से संपर्क करना चाहिए।

14. बालक को दैनिक क्रिया कौशल में आत्मनिर्भर बनाना चाहिए।

15. विशेष उपकरणों का प्रयोग करने में सक्षम बनाना चाहिए।

16. मनो-सामाजिक क्रियाएं भी करानी चाहिए।

17. शैक्षिक तथा व्यवसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।

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